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निर्माणाधीन

Ladi sayadoji

माननीय लेडी सयाडो* का जन्म 1846 में उत्तरी बर्मा के श्वेबो जिले (वर्तमान में मोनैवा जिला) में सैप-पीन गांव की दीपेईन बस्ती में हुआ था । उनके बचपन का नाम मोंग टेट खींग था । (मोंग लड़कों और युवाओं के लिए मास्टर के समतुल्य, बर्मा उपाधि है, टेट का अर्थ ऊपर की तरफ चढ़ना है और खींग का अर्थ शिखर है ।) यह एक उपयुक्त नाम साबित हुआ, क्योंकि युवा मोंग टेट खींग, वास्तव में, अपने सभी प्रयासों से शिखर पर चढ़ गए ।

अपने गांव में उन्होंने पारंपरिक मठ विद्यालय में भाग लिया जहां भिक्षुस (भिक्षुओं) ने बच्चों को बर्मा में पढ़ाई -लिखाई के साथ-साथ पाली मूलग्रंथ को पढ़ना भी सिखाया था । इन सर्वव्यापी मठ स्कूलों के कारण, बर्मा ने परंपरागत रूप से साक्षरता की एक उच्च दर कायम रखी है ।

आठ साल की उम्र में उन्होंने अपने प्रथम गुरु यू नंदा-धजा सयाडो के साथ अध्ययन करना शुरू किया, और उन्हें पंद्रह वर्ष की आयु में उन्ही के अधीन एक सामनेरा (नवदीक्षित) के रूप में नियुक्त किया गया । उन्हें नाना-धजा (ज्ञान की पताका) नाम दिया गया था । उनकी मठवासी शिक्षा में पाली व्याकरण और पाली नियम के विभिन्न ग्रंथ जिनमें अभिधम्मत्ता-संगहा, एक टिप्पणी जो नियम के अभिधम्म** अनुभाग की नियमावली के रूप में कार्य करती है, की एक विशेषता थी, शामिल थे ।

बाद के जीवन में उन्होंने अभिधम्मत्ता-संगहा पर कुछ विवादास्पद टिप्पणी लिखी, जिसे परमत्ता-दीपाणी (जिसे अंतिम सत्य की नियमावली) कहा जाता है, जिसमें उन्होंने कुछ गलतियां जो पहले हुई थीं को ठीक कर दिया था, और उस समय उस काम पर टिप्पणी की गयी । उनके सुधारों को अंततः भक्तों ने स्वीकार कर लिया और उनका काम मानक संदर्भ बन गया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य भाग में एक सामनेरा के रूप में अपने दिनों के दौरान, आधुनिक प्रकाश से पहले, वह नियमित रूप से दिन में लिखित ग्रंथों का अध्ययन करते और अंधेरे से बाद की स्मृति से भिक्षुस और अन्य सामनरियों के साथ सस्वर पाठ में शामिल होते । इस तरह से उन्होंने अभिधम्म ग्रंथों में महारत हासिल की ।

जब वे 18 साल के, सामनेरा नाना-धजा थे तो उन्होंने लबादा छोड़ दिया और आम आदमी के रूप में अपनी जिंदगी में वापस आ गए । वह अपनी शिक्षा से असंतुष्ट हो गए थे, यह महसूस कर रहे थे कि यह बहुत ही संकीर्ण रूप से टिपिटका+ तक सीमित है । लगभग छह महीने के बाद, उसके प्रथम गुरु और एक अन्य प्रभावशाली गुरु , मिहिन्थिन सयाडो उनके पास भेजे गए और उन्होंने मठवासी जीवन में वापस आने के लिए उन्हें मनाने की कोशिश की; लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया

मिहिन्थिन सयाडो ने सुझाव दिया कि उन्हें कम से कम अपनी शिक्षा जारी रखना चाहिए । युवा मोंग टेट खींग कांतिमान और सीखने के लिए उत्सुक थे, तो वह आसानी से इस सुझाव से सहमत हुए ।

"क्या आप वेदों को सीखना चाहते हैं, जो हिंदू धर्म के प्राचीन पवित्र लेख हैं?" मिहिन्थीन सयाडो नें पूछा

"हां, माननीय महोदय," मोंग टेट खींग ने उत्तर दिया

सयाडो ने उत्तर दिया, "ठीक है, तो आपको इसके लिये एक सामनेरा बनना पड़ेगा, अन्यथा, येउ गांव के सयाडो यू गंधमा आपको अपने छात्र के रूप में नहीं लेंगे ।"

"मैं एक सामनेरा बनने के लिये तैयार हूँ", वे सहमत हुए ।

इस तरह वे नवदीक्षितों के जीवन में वापस लौट आये और फिर कभी एक भिक्षु के लबादे को नहीं छोड़ा । बाद में, उन्होंने अपने शिष्यों में से एक को विश्वास दिलाया, " पहले मैं लोगों की किस्मत बताकर वेदों के ज्ञान के साथ जीवित रहने की उम्मीद कर रहा था लेकिन मैं और अधिक भाग्यशाली था कि मैं फिर से एक सामनेरा बन गया । मेरे गुरु बहुत बुद्धिमान थे, उनके असीम प्यार और करुणा से, उन्होंने मुझे बचा लिया।"

गंधमा सयाडो की देखरेख में प्रतिभाशाली सामनेरा नाना-धजा, आठ महीनों में वेदों में महारत हासिल कर लिए और टिपिटका के अध्ययन को भी जारी रखा । 20 साल की उम्र में, 20 अप्रैल, 1866 को, उन्होंने अपने पुराने गुरु यू नंदा-धजा सयाडो के अधीन एक भिक्षु बनने के लिए उच्च समन्वय लिया, जो कि उनके उपदेशक(एक व्यक्ति जो उपदेश देता है) बन गए थे ।

1867 में, मानसून के पहले, भिक्षु नाना-धजा ने अपने पूर्व गुरु और मोनैवा जिला को छोड़ दिया जहां वे बड़े हुए थे ताकि वे मांडले में अपनी पढ़ाई जारी रख सकें ।

उस समय, राजा मिन डॉन मिन के शासनकाल के दौरान, जिन्होंने 1853-1878 तक शासन किया, मांडले, बर्मा की शाही राजधानी थी और देश का सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र था । उन्होंने कई प्रमुख सयाडों के अधीन अध्ययन किया और विद्वानों से भी सीखा। वह मुख्य रूप से महा-जोतिकरमा मठ में रहते थे और वेन. सान-कायांग सयाडो, एक गुरु जो बर्मा में शुद्धि के विसुद्धिमगा पथ का बर्मी में अनुवाद करने के लिए प्रसिद्ध थे, के साथ अध्ययन करते थे ।

इस समय के दौरान, वेन. सन- कायांग सायाडो ने 2000 छात्रों के लिए 20 प्रश्नों की परीक्षा दी । भिक्षु नाना-धजा केवल एक ही थे जो सभी सवालों के संतोषजनक ढंग से जवाब देने में सक्षम थे । इन उत्तरों को बाद में 1880 में पारामी-दीपाणी (सिद्धताओं की नियमावली) के तहत प्रकाशित किया गया था, कई पुस्तकें पहले पाली और बर्मी में वेन लेडी सायाडो द्वारा लिखी गईं ।

मांडले में उनकी पढ़ाई के दौरान राजा मिन डॉन मिन ने पांचवीं परिषद प्रायोजित की एवं टिपिटका को पढ़ने और शुद्ध करने के लिए पास व दूर के स्थानों से भिक्षुओं को आमंत्रित किया । परिषद 1871 में मांडले में आयोजित की गई थी और प्रमाणीकृत ग्रंथो की जानकारी को 729 संगमरमर की शिलाओं में खोदा गया, जो आज भी वहां स्थित हैं, प्रत्येक शिलालेख मांडले पर्वत के निचले हिस्से में स्वर्ण कुथोडो पगोडा के आसपास के एक छोटे से पगोडा के नीचे स्थित हैं । इस परिषद में, भिक्षु नाना-धजा ने अभिधम्म ग्रंथों के संपादन और अनुवाद में मदद की ।

आठ साल बाद एक भिक्षु के रूप में, अपनी सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण कर चुके वेन. नाना-धजा महा-जोतिकरमा मठ में परिचयात्मक पाली के गुरु के रूप में अर्हता प्राप्त कर चुके थे जहां वे अध्ययन करते थे ।

वे आठ साल और वहां रहे, शिक्षण और अपने स्वयं के शैक्षिक प्रयासों को जारी रखने के लिए, वे 1882 मोनैवा चले गए, वे अब 36 साल के थे । उस समय मोनैवा चिंदविन नदी के पूर्वी तट पर एक छोटा सा जिला केंद्र था, जो एक ऐसी जगह के रूप में प्रसिद्ध था जहां शिक्षण विधि में केवल चयनित भाग के बजाय संपूर्ण टिपिटका शामिल थी ।

मोनैवा में भिक्षुस और सामनरियों में पाली को पढ़ाने के लिए, वह दिन के समय नगर में आते थे, लेकिन शाम को वह चिंदविन नदी के पश्चिमी तट से पार होकर और लाक-पैन-टॉँग पर्वत के छोर पर एक छोटे विहार (मठ) में अपनी रातों को ध्यान साधना में बिताते थे लाक-पैन-टॉँग पर्वत की हालांकि हमारे पास कोई निश्चित जानकारी नहीं है, ऐसा लगता है कि यह वह समय था जब उन्होंने पारंपरिक बर्मी मार्ग से विपश्यना का अभ्यास करना शुरू किया: अनापना (श्वसन) और वेदना (सनसनी) पर ध्यान देते हुए ।

1885 में अंग्रेजों ने बर्मा पर कब्जा कर लिया और अंतिम राजा थिबॉ को निर्वासन में भेजा, जिन्होंने 1878-1885 तक शासन किया था । अगले साल, 1886 में, वेन. नाना-धजा लेडी वन में वापस चले गए, जो कि मोनैवा की उत्तर दिशा में स्थित है । कुछ समय बाद, कई भिक्षु उनके पास आने लगे, यह आग्रह करने के लिए कि वे उन्हें शिक्षित करें । उनके रहने के लिए एक मठ बनाया गया था और नाम रखा गया लेडी-तौय मठ । इस मठ की वजह से उनका नाम प्रसिद्ध हुआ: लेडी सायाडो । मोनैवा एक बड़ा शहर हो गया, ऐसा कहा जाता है कि इसके मुख्य कारणों में से एक यह है कि इतने सारे लोग लेडी सायाडो के मठ की ओर आकर्षित हुए थे । जब उन्होंने लेडी-तौय मठ में कई इच्छुक छात्रों को पढ़ाया था इसके अलावा उन्होंने अपने ध्यान के लिए नदी के पार अपने छोटे झोपड़ी विहार में सेवानिवृत्त होने का अपना अभ्यास जारी रखा ।

जब वे लगभग १० वर्षों के लिए लेडी वन मठ में थे , तो उनके मुख्य शैक्षिक कार्यों को प्रकाशित करना शुरू किया गया था । सबसे पहले परमत्ता-दीपाणी (अंतिम सत्य की नियमावली) जिसका ऊपर उल्लेख हुआ था, 1897 में प्रकाशित हुआ । इस काल की उनकी दूसरी पुस्तक निरुत्ता-दीपाणी थी, जो पाली व्याकरण पर आधारित एक पुस्तक थी । इन पुस्तकों की वजह से उन्होंने बर्मा में सबसे ज्यादा शिक्षित भिक्षुओं में से एक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की ।

हालांकि लेडी सायाडो का नाम, लेडी-तौय मठ पर आधारित था फिर भी समय-समय पर उन्होंने बर्मा में ध्यान और शास्त्र दोनों को पढ़ाते हुए यात्रा की । वे वास्तव में एक भिक्षु का एक दुर्लभ उदाहरण है, जो परियत्ति (धम्म का नियम) और पटिपट्टी (धम्म का अभ्यास) में उत्कृष्टता प्राप्त करने में सक्षम थे । बर्मा में इन यात्राओं के दौरान उनकी कई प्रकाशित रचनाएं लिखी गईं थीं। उदाहरण के लिए, उन्होंने दो दिन में पटिका-समुप्पादा-दीपाणी लिखी, जब वे मांडले से प्रोमे के लिए नाव से यात्रा कर रहे थे । उनके पास कोई संदर्भ पुस्तक नहीं थी, लेकिन, क्योंकि उनके पास टिपिटका का संपूर्ण ज्ञान था, उन्हें किसी मदद ज़रूरत नहीं थी बौद्ध धर्म के नियमावली में उनके लेखों के तहत सूचीबद्ध 76 नियमावलियाँ, टिप्पणियां, निबंध इत्यादि हैं, लेकिन ये भी उनके कार्यों की एक अपूर्ण सूची है ।

बाद में, उन्होंने बर्मी में धम्म पर कई किताबें भी लिखीं । उन्होंने कहा कि वह इस तरह से लिखना चाहते हैं कि एक साधारण किसान भी समझ जाये । उनसे पहले, धम्म विषयों पर इस तरह लिखना असामान्य था ताकि लोग उसे समझ सकें । यहां तक ​​कि मौखिक रूप से शिक्षण करते समय, भक्त आमतौर पर पाली में लंबा अंश पढ़ते हैं और फिर उन्हें शाब्दिक रूप से अनुवाद करते हैं, जो आम लोगों को समझने में बहुत कठिन था। यह लेडी सायाडो की व्यावहारिक समझ और परिणामस्वरूप मेटा (प्रेम-कृपा) की ताकत रही होगी जो धम्म को समाज के सभी स्तरों पर फैलाने की अपनी इच्छा से भरे थे । उनके परमत्ता-संखेपा, जो बर्मी की 2,000 छंदों की पुस्तक है, जो अभिधम्मत्ता-संगहा का अनुवाद है, युवा लोगों के लिए लिखी गयी थी और आज भी बहुत लोकप्रिय है । उनके अनुयायियों ने कई संगठनों को शुरू किया, जिन्होंने इस पुस्तक का उपयोग करके अभिधम्म की शिक्षा को बढ़ावा दिया ।

बर्मा के अपनी यात्रा में, लेडी सायाडो ने भी गाय मांस के उपभोग को हतोत्साहित किया । उन्होंने गो-ममसा-मटिका नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें लोगों को भोजन के लिए गाय को न मारने के लिए आग्रह किया गया और शाकाहारी आहार को प्रोत्साहित किया गया है ।

यह इस अवधि के दौरान, शताब्दी के परिवर्तन के ठीक बाद, वेन. लेडी सायाडो से पहली बार यू पो थेट ने मुलाकात की और उनसे विपश्यना सीखी और बाद में वे बर्मा में सबसे प्रसिद्ध ध्यान गुरुओं में से एक बन गए, वे स्याजी ऊबा खिन के व गोयन्काजी के गुरु थे ।

1911 तक उनकी प्रतिष्ठा एक विद्वान और ध्यान स्वामी दोनों के रूप में इतनी बढ़ गई थी कि भारत की ब्रिटिश सरकार, जिसने बर्मा पर शासन किया, ने उन्हें अग्मामह-पंडिता(सबसे महान विद्वान) का नाम दिया । उन्हें रंगून विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट ऑफ़ लिटरेचर से सम्मानित किया गया । 1913-1917 के दशक के दौरान उन्होंने लंदन में पाली टेक्स्ट सोसाइटी की श्रीमती रेज-डेविडस के साथ एक पत्राचार किया था और अभिधम्म के अंक पर उनकी कई चर्चाओं के अनुवाद को पाली टेक्स्ट सोसाइटी के दैनिक लेख में प्रकाशित किया गया था ।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वेन लेडी सायाडो की दृष्टि उन्हें असफल करने लगी, क्योंकि उन्होंने अक्सर कम रोशनी के साथ पढ़ने, अध्ययन करने और लिखने में वर्षों बिताए थे । 73 वर्ष की आयु में उनकी आँखों की रोशनी चली गई और उन्होंने अपने जीवन के शेष वर्षों को ध्यान तथा ध्यान के शिक्षण के लिए समर्पित किया । उन्होंने 1923 में 77 साल की उम्र में पनिमना में, मंडालय और रंगून के बीच, कई मठों में से एक में प्राण त्याग दिए, जो कि उनके नाम पर बर्मा भर में उनकी यात्रा और शिक्षण के परिणामस्वरूप स्थापित हुए थे ।

माननीय लेडी सयाडो शायद उनकी उम्र के सबसे उत्कृष्ट बौद्ध व्यक्ति थे । जो व्यक्ति हाल ही के वर्षों में धम्म के मार्ग से उनके संपर्क में आए हैं, वे इस विद्वान, संत संन्यासी की कृतज्ञता के महान ऋणी हैं, जो विपश्यना के पारंपरिक अभ्यास को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, जो इसे छोड़ने वालों के लिए और अधिक उपलब्ध कराते थे और लोगों को समान रूप से प्रस्तुत करते थे । अपने शिक्षण के इस सबसे महत्वपूर्ण पहलू के अतिरिक्त, उनके संक्षिप्त, स्पष्ट और व्यापक विद्वत्तापूर्ण कार्य ने धम्म के अनुभवात्मक पहलू को स्पष्ट किया ।

* उपाधि सयाडो, जिसका अर्थ माननीय गुरु है, जो मूल रूप से मुख्य ज्येष्ठ भिक्षुओं (थेरास) को दिया जाता था जिन्होंने राजा को धम्म में उपदेश दिया था। बाद में, यह सामान्य रूप से उच्च सम्मानीय भिक्षुओं के लिए एक उपाधि बन गया ।

** अभिधम्म पाली नियम का तीसरा भाग है जिसमें बुद्ध ने दिमाग की वास्तविकता के बारे में अत्यंत गहन, विस्तृत और तकनीकी विवरण दिए ।

+ टिपिटका संपूर्ण नियम के लिए पाली का नाम है। इसका अर्थ है तीन टोकरी, अर्थात्, विनय की टोकरी (भिक्षुओं के लिए नियम); सूतों की टोकरी (प्रवचन); और अभिधम्म की टोकरी ।